Monday, 23 September 2013

जिन्दगी एक नज़रिये की तरह............

 इंसान किसी को कैसे देखता हैं, यह उसके नज़रिये पर निर्भर रहता है। जिन्दगी कहीं ऐसे लोंगो से मिलाती हैं जिन से हम बहुत कुछ सीखते और सीखाते हैं। अपने जन्म से मुत्यु  तक यह सीखने और सीखाने की प्रक्रिया चलती जाती हैं। जन्म से बोलने सीखने की कोशिश ..विघालय जाने पर शिक्षा सीखने की कोशिश....शिक्षा सीखने के बाद ..नौकरी सीखने की कोशिश ...यह सीखने की कोशिश ता उर्म चलती रहती हैं। इन सब सीखने पर नज़रिया सबसे मुख्य भूमिका अदा करता हैं।
वाकेई जिन्दगी एक नज़रिये की तरह हर रोज़  कूछ नया सिखाती हैं...
                                                         

Tuesday, 6 August 2013

मन का विश्वास हैं.................

कुछ तो है..
      जो मन आश बंधता है
कुछ कदम आगे बढ़ने देता है
      थमने से पहले कदमों को बल देता ...
            अपने में बुनियाद की नीव रखता है..
नीव को अकार देता हैं...
                 उसे थकने से पहले फिर बुनियाद  देता हैं......................
                                                        यह सब मन का विश्वास हैं.....

Wednesday, 2 January 2013

सवाल की जड़ो को सोचना........

कुछ दिन से हर जगह एक ही र्चचा है, स्त्री सुरक्षा। समाज के हर वर्ग में स्त्री की सुरक्षा के लिये अवाज उठ रही हैं। लोगों जगह-जगह केंडल मार्च,धरने आदि का प्रर्दशन कर रहे है। इस सब के प्रति समाज में चेतना का प्रर्दूभाव कैसे आया यह हमारी सोच पर प्रश्न चिह्रन (?) लगता हैं। क्या सदीयों से सो रही सोच के प्रति लोगों में चेतना एकदम कैसे आई।
क्या महिला शोषण एक ही दिन में इतना बढ़ गया की लोग समाज में परिवर्तन की मांग करने लगे। नहीं सवाल की जड़े ऐसे ही पैदा नहीं होती, कहीं कारण हैं, जो ऐसे सवाल सोचने पर मजबूर करते हैं। हाल ही में दिल्ली में  एक युवती घिनौने अपराध की शिकार होती हैं, तो लोंगो में ऐसे सवाल बड़ा रुप ले लेते हैं। क्यों नहीं अन्य जगह पर जब स्त्री के साथ अपराध होते हैं, तो जनता अव़ाज नहीं  उठाती। हमारे न्यायालय कहीं वर्षा से न्याय नहीं दे पाते हैं। साथ ही राजनीति अपने लाभ के लिये ढ़ोग करती हैं।
हम अपराधों के बढे़ कारणों पर बहश करते हैं, परन्तु कारणों की वस्तविक जड़ो पर र्चचा करना भूल जाते हैं। जिसमें शराब के विषय में कोई प्रश्न नहीं कर रहा? जो सबसे बढ़ा कारण थी ,दिल्ली लड़की कैश में। ऐसे अपराधों की जड़ो को जन्म देने वाले कारकों को समझना चहिये हैं। केवल शराब व्यपार सरकार को आमदनी देंते हैं, इन्हें व्यपार के रुप में नहीं देखना चहिये। समाज को जितना दूषित शराब तत्व कर रहा है, उसके उदारहण रोज कोई न कोई अपराध के रुप में दिख जाते हैं।

ऐसे कहीं कारण हैं ......जिसे समाज को समझना होगा। उनके प्रति समाज को कढे़ फैसले लेने होगे। सवालो के प्रति जबाव की गति दूगनी करनी हैं। जो समाज को सही गति और दिशा दें सकें।

Thursday, 20 December 2012

मैं..............

पैदा हुआ तो लोग खुशी मनाने आये ..
जब मौत हूई तो लोग संत्वना देने आये
दोनों में अंतर ढूँढ़ रहा था?
पैदा होने में चेतना थी,
मरने पर वह चेतना र्निजीव थी।
बस दोंनो ही स्थिति मेरे पास, 
मैं... की स्थिति भिन्न थी...

जब समय था, तो लोगों ने समझा नहीं..
जब समय छूटा, तो लोग समझने आये ..
दोनों ही स्थिति ....मैं.... भिन्न था...
एक स्थिति मैं... अपने परिवार को बनाने में लगा था ...
दूसरी स्थिति मेरा... परिवार मुझे संभालेन में लगा था.
एक मैं.... आपनों को कंधा देता था।
दूसरे मैं .....उन के कंधो के इंतजार में था....


मैं दोंनो ही स्थिति में भिन्न था.....

Monday, 17 December 2012

क्या करने की फिराक में है ?.....

कभी मन सोचता यह कर लूँ, यह ना करूँ...
कभी मन सोचता है, ऐसे सवालों की जड़े ढूँढ लूँ...
अखिकार मन किस फिराक को ढूँढता हैं।
जिस मन में सवालों का अंबार हो.....
उस मन की दशा का क्या हाल बंया कर संकू।
स्थिति मन की न तब बदली थी, न अब बदली है.....
बस मन के फिराक में सवाल बदले है..
सवाल बस मन के यही पूछते है।
क्या करने की फिराक में है ? ..........


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Saturday, 8 December 2012

याद ...

आज कहीं दिन बाद कुछ तस्वीरों पर नजर गई, सोच रहा हुँ। समय की रफ्तार कितनी गति से कितना कुछ बदल देता हैं। सोच कर हर यादें आज अजीब सी मायूसी मन को करा रही है। कुछ पंक्ति लिख रहा हुँ......


 जब सोचा अपने बिते दिनों को,
        मन में कही सवाल खड़े हो गये।
               हर सवाल अपने अन्तर द्घंद से ,
                              सवालों को व्यंग छोड़ गये।
उस व्यंगो की माया अपने में,
       कहीं कल्पना के रंग छोड़ गये।
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               कभी-कभी ऐसी तस्वीरों में रंग होते हुये भी रंग फिकें होतें हैं।................
  

Friday, 30 November 2012

शब्दों की बुनियाद..

कभी शब्द ऐसी बातों को रच देता,
जो रचा हुआ अनोका लगता हैं।
उन शब्दों कि रची ध्वनियों से ,अपने आप को अकेला पाता हूँ।
कभी मन की गहराई, रचे शब्दों से कांप जाता हैं।
कभी उन्हीं शब्दों की मायूसी अपने आप में डूबाता हैं।


         फिर भी शब्द अपनी बुनियाद बनाये रखता है................