Wednesday, 28 June 2023

बहुत दिन से दो बातें लिखने की सोच रहा था ..पर वक्त ही नहीं मिला..

आज कुछ वक्त मिला तो लिख रहा हूं...

कुछ दिन पूर्व मेरी शादी की पांचवी वर्षगांठ थी .. मेरी धर्मपत्नी ने कहा आपको इस बार कोई गिफ्ट नहीं दिया .. और दूसरे दिन देखता हूं कि मेरी पत्नी ने मेरे पिता की एक फोटो फ्रेम मुझे दिया.. पिता के साये को गये लगभग १३ वर्ष हो गए.... मैंने कभी पिता की तस्वीर को अपने साथ नहीं रखा.. हां गुड़गांव और दिल्ली में एक फ्रेम पिता की तस्वीर का था .. पर २०१५ से छत्तीसगढ़ आने के बाद अपने पास कोई तस्वीर पिता की नहीं रखी... क्योंकि जब भी पिता की याद आती है तो मन बेचैन हो जाता है... शायद इस बेचैनी से भागने की कोशिश करता हूं... और बचपन की सुनहरी यादें परेशान करती है... इसलिए हमेशा तस्वीर से दूर रहने का सोचता रहा हूं... पर जब धर्मपत्नी ने मुझे पिता की एक तस्वीर का फ्रेम दिया तो मेरे पास शब्द नहीं थे...


दूसरा हिस्सा कुछ दिन पूर्व मेरा पुत्र विभु अपने दादी के घर से आया और साथ में एक खिलौना लेकर आया ...यह खिलौना १९९७ का है जब पिता ने मुझे एक वीडियो गेम दिया था.. इस खिलौने में बैटरी नहीं थी ..बैटरी डाली तो यह खिलौना आज भी चालू स्थिति में है .....जब मैंने अपने बेटे को कहा कि बेटा यह तेरे दादा ने मुझे दिया था तो उसके पास एक अलग खुशी थी... जिसे शायद शब्द न दे पायूं.. और उस खुशी में शायद पिता को देखने का अलग सकून था....




यह सब यादों का खजाने है जहां बहुत कुछ है ... बस लिखने को हम शब्द नहीं दे पाते है....

 

Saturday, 18 August 2018

सोच

मुझे विषय नही मिल रहा था कि क्या लिखूं ...काफी सोचने के बाद मित्र नें विषय दिया .."सोच"..लोकिन इसके बाद विषय में लिखूं क्या यह समझ नही आ रहा था .तो शुरूआत कि जीवन के पड़ाव से..
जीवन के हर पड़ाव को बस कुछ नामों से सम्बोधित करते ...कभी बचपन ..कभी जवानी ..तो कभी बुढ़ापा ...जीवन इन पड़ावों से गुजर कर अपना रास्ता तय करता है...सभी पड़ाव के अपने-अपने दायरें है...सभी कि अपनी उपयोगिता है...
कोई भी पड़ाव छुटे अंत नही होता ...कहने का अर्थ है कि मौत इन पड़ावों के बाद ही अपनी गति को रोकती है...
पहले पड़ाव कि बात करें तो इस कोइ कभी नही भुल सकता ..इसके होने कि महक ता उर्म इंसान के जहन में अपने होने का अर्थ देती है..जिसे नकार देना इंसान कि सबसे बड़ी भूल हो सकती है..उम्र बितने के साथ इंसान यह कहना नही भूलता की बचपन में मैंने ऐसा किया और ऐसा नही ..यह वाक्य उसके जहन में हर वक्त रटा रहता है ....इन वाक्यों के बिना इंसान अधूरा ही होता है..
बचपन के हर लम्हें को हम जैसा चाहे जी सकते ना किसी का दबाव होता है ..ना किसी कि बंदिश होती है ...हम अपनें विचारों से ...भाव से ..मन से ...जहन से..दिल से..दिमाग से...दबाव से ...हर रुप में पाक साफ होते हैं ...जहां गलतियाँ बचपनें के नाम से मशहूर होती हैं...तभी तो कहते बचपन -बचपन हैं जिसे कभी भुला नही जा सकता...जिसे जैसे रुप में उसे समझना है ...वह वैसे समझ सकता है ..मन आपका है ..तो सोचने कि इच्छा भी आपकी है ...बचपन भी आप का ही है...
दूसरे पड़ाव में जिन्दगी उलझने पैदा करना शुरु कर देती ..जहां बचपन का बचपना दुर हो जाता है ...समझ का दायरा पैर प्रसार लेता है...जहां गलतियां ...गलती में गिनी जाती है...अब बचपन अपने दायरें को बहुत पीछे छोड़ देता है...उलझने सीमा से परे सोचने को मजबूर करनें लगती है...अब जहन ..भाव..विचार... सोच ...मन ..उम्मीद..बंदिशें ...सब का दायरा बड़ जाता हैं...अब समझ नही होती... रटी बातें प्रभावी होती हैं...जहां बाहरी अडंबर हावी होता ..किसी को किसी जिद्द होती ...जहां भागने कि कोशिश रहती है...रेस में सब से आगे निकलने कि चाह हावी होती...जहां लड़ाई दूसरे से  ज्यादा अपने आप से होती है...
यह पड़ाव अपने में सब कुछ समा कर रखता है ..जिसे जिताना खोजे वह उतना जहन को निचोड़ता है...कभी दायरें मजबूरी का रुप लेते है ...अब जीवन तरह-तरह के रंगों से भरें होने कि जगह ..बेरंग छवि का होता है ...अब बचपन जहन में खुशी का संचार का माध्यम होती है ..जिसे सोचकर खुश होने का मंत्र लिया जाता है .......  
ऐसा नही कि हर दूसरे पड़ाव में हर कुछ उलझन में होता है...कुछ उलझने समझते-समझते जीवन के होने का अर्थ समझने में असानी हो जाती हैं... और बहुत कुछ अच्छा भी होता है..जहां आशा...दिलासा...उम्मीद....धैर्य ...कर्म...ओर बहुत कुछ जीवन को बांध कर रखता है...कुछ पल को व्यक्ति बस समझता है...कि यह नियम संसार में सब के साथ बंधा होता है..उस से भागा नही जा सकता ..उस का होना एक निर्धारित क्रम में जीवन ने लिखा ...बस उस का सामना करना ही अंतिम लक्ष्य है ...जहां विजय आप के साहस पर है ...आप अपने आपसे विजय होकर संतुष्ट होते है..
तीसरा पड़ाव बुढ़ापा है..जो आना सबके साथ तय....यह फिर हमें बचपन कि ओर खींच लेता है ..जहां अंत का इंतजार होता हैं .. बस ...इंतजार...इंतजार ...ओर इंतजार....



Saturday, 14 April 2018

कलम को बस चलने दो...

कभी-कभी बिना सोचे कलम को चलने दिया जाता है.....चलने इसलिए दिया जाता है... क्योंकि दिमाग का बोझ कम हो सके... पर बहुत कुछ सोचने और लिखने को होता है... पर लिख नहीं पाते है। समाज में बहुत से विषय है जिस पर कलम रोज लिखने को कहती है ...पर लिखने की तीव्रता शांत सी हो गई है। जिसमें कम विचारों का बोझ है ...जो बिना धार वाली तलवार जैसी मालूूम होती है। लिखना पसंद है ... पर ऐसा लिखना जिसमें मन बैचेन न हो ..बल्कि जिसे लिखने के बाद मन शांत हो सके। ऐसे लिखने के लिए कलम चलनी चाहिए.. पर ऐसा होता नहीं है।
कलम शांत होने के लिए नहीं हो सकती ...वह विचारों को और अधिक विभाजित कर देती है.. वह उतनी ही तीव्र गीत से मस्तिष्क पर बोझ डालती है। जिसमे लिखने की कला का कौन सा विचार काम करता है.. नहीं पता होता हैै...पर मन के कोने पर विचारों की उथल-पुथल परेशान जरुर करती हैै।
समाज को जितना अधिक समझने का प्रयास करते है...  वह समाज वैसा ही जवाब देता है की दुनिया ऐसी क्यों है?...... कभी-कभी विचार भी स्वंय में सवाल पूछने लगते है की यह जो सोच रहा हूँ... वह सही है... सही सोचता हूँ.. तो क्रिया भी वैसी ही हो..... पर बार-बार सोच हारने लगती है .. मन का कोना एक ही सवाल का उत्तर यह कहकर देता है कि इससे बेहतर है.. और कुछ जिन्दगी में सपने हैै... जो कभी हारने नहीं देते है.. शायद बहुत कुछ है जिसे सीखने की ललक अभी बाकि है .. जिसे ता उम्र सीखना है..
हार होने के बाद फिर नया रास्ता तय होता है और वह अधिक तीव्र गति से मस्तिष्क को सोचने देगा .. ऩई उर्जा से कार्य करने को कहता है..
फिर नये सपने को पंख देता है .. हार फिर कुछ नया अनुभव देता है.. नया तय करने को कहता है..
मंजिल को जीतना ढूंढते है... वह उतना अधिक भटकाव देगी ..
पर मंजिल जरुर मिलेगी...

Monday, 23 January 2017

क्या शहर बदल देता है?


शहरों की चकाचोैंध हमेशा से ही लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रही है। जहां की रौनक लोगों को उसी धरातल पर बसने की बेबसी पैदा करती है। यह बेबसी डर से निर्मित नहीं होती है, इसके बीज को अंकुरित होने में वही पानी और खाद्य होती है जिसे हम मस्तिष्क में उपजने का मौका देते है।
शहरों का अपना रूप है, अपना आकर्षण, अपना सौंदर्य, अपनी चमक जो व्यक्ति को एक बार आने के बाद बसने का मौका ही नहीं बल्कि एक उस समाज से रूबरु कराती है, जहां भीड़ है पर लोग शांत रहना जानते है। वही भागती जिन्दगी जीवन की एक परिभाषा होती है। शहरीपन एक मद पैदा करता है। मद हमेशा से आवेश में बौखलाहट पैदा करने का काम करता है। वही बौखलाहट शहरी जीवन का एक अर्थ होता है।
शहर के कौन से कोने से क्या लागव हो जाए पता ही नहीें चलता। ऐसे लगाव में सब अपना सा लगता है। जिस गांव, मोहल्ले, गली की रौनक को शहरों में महसूस करने लगते है। शहरों में अपने होने की चर्चा करते है। आधे में पूरे होने की जिद्द पैदा करते है। शहरी चकाचौंध में कभी-कभी अपने आपको अपने से अलग कर देते है। जिसकी रोशनी केवल आँखों में कल्पना का काला चश्मा बांधने का काम करती है। जिस दिन वह काला चश्मा आँखों से उतरता है... उस दिन हम अपने आपको दूर महसूस करते है।
क्यों शहरों की ऐसी छवि जहन में तैयार होती है। छवि का आकार विचित्र कल्पना से निर्मित होता है जिसे जितने भी कोण से देखते है, वह उतना ही अलग दिखता है।
शहरों का न पानी अच्छा होता है, ना हवा फिर भी हर कोई इसी शहर में रहने की इच्छा करता है। केवल पानी और हवा का ही अंतर नहीं व्यक्ति के विचारों को शहर परिवर्तित कर देता है। विचारोें की काया में बहुत कुछ बदल जाता है। जिसमें व्यक्ति को स्वंय से बड़ा कुछ नहीं दिखता है, केवल व्यक्ति के जहन में अधिक से अधिक इच्छा पूरी करने की ख्वाहिश पलती है, जो जहन को ऐसे परिवर्तित कर देती है कि इंसान स्वंय के रिश्तों में भी लाभ की तलाश करता है। केवल व्यक्ति स्वंय में सिमटने की कोशिश करता है। सब कुछ बदलने की कोशिश करता है। हम चाहकर भी इच्छा को रोकते नहीं बस शहरों की चकाचौंध में रिश्तों की तलाश करने लगते है, जो स्वंय में पूर्ण होने की आभा दे सके।
क्या है शहरों के मिट्टी में, हवा मेंपानी में जो बदलाव पैदा करता है। क्या है? जो व्यक्ति में स्वंय का ही बोध करता है। लोग केवल दौड़ लगा रहे होतें हैं... कोई नौकरी के लिए, कोई पढ़ने के लिए, कोई सुकून की तलाश के लिए। इसी दौड़ में एक दिन शुरू होता है अध्यात्म का खेल। जो दौड़ते जीवन को शांति देने का ढोंग करता है। जो दिलासे बांधने की जमीन देता है। अध्यात्म शहरी जीवन में बदलाव की किरण का काम करता है जिसे केवल महसूस कर सकते है, लेकिन बदलता क्या है?
क्या शहर बदल देता है?


Thursday, 8 December 2016

क्या होगा किसी उद्देश्य का अंतिम बिंदु?

"हिम्मत करने वाले की हार नहीं होती" यह वाक्य हमेशा आपने सुना होगा। जब भी कोई हार जाता है तो हम यही तो कहते है कि हार मत मान प्रयास करते रहो। समय बदलेगा और हार जीत में परिवर्तित होगी। लेकिन समय से बलवान कुछ नहीं है। समय सब निर्धारित कर देता है।
इन सब विचारों में केवल दर्शन की महक है जीवन इससे बहुत भिन्न है जिसमें हार केवल हार है और जीत केवल जीत। जीत केवल उम्मीद, आस, भविष्य की कल्पना को ढोर देने का काम करता है, तो हार केवल दर्द, घुटन, कायरता की गूंज पैदा करेगा। 
हम हमेशा हार को जीत में परिवर्तन करने की कोशिश करते है। कोशिश के लिए प्रयास की रोशनी की तलाश करते है। अपने आपको दिलासा देने की कोशिश करते है। जिसमें जीवन का दर्शन तय किया जाता है।
पहाड़ो में एक कहावत प्रचलित है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी कभी पहाड़ के काम नहीं आती है। वैसे ही जीवन के रास्ते को तय करते हुए यह लगने लगता है की पहाड़ के जीवन की तरह हमारी जिंदगी है। जहां हमेशा केवल विचारों को, सपनों को, उम्मीदों को, नई सोच को तय होने के बाद हम उसका इस्तेमाल ही नहीं कर पाते हैें। हर बार विचारों के आधार पर उसे बुनते है। कभी किसी सपने को पूरा करते हैं तो कभी बस निर्धारित करते-करते रह जाते है।
कभी भी अपने विचारों को समझ ही नहीं पाया हूँ जब भी समझने का प्रयास किया। केवल खाली मस्तिष्क में शून्य का बिंदु पाया है। जीवन की राह कब किसे निर्धारित करने का मौका देती है और किसे विराम कभी तय ही नहीं हो पाता है। एकाएक एक दिन समय के साथ जवाब मिल जाना ही जवाब होता है।
कभी सवाल यह उठता है कि जीवन के सफर में किसी उम्मीद को तय करने और बंद करने का निर्धारण कब बंद करना चाहिए। जब भी उत्तर की खोज करता हूँ तो केवल विचारों की क्रांति में मस्तिष्क के धरातल को सोच के करीब तय करने का पहला मौका देती है और बंद करने का भी मौका।

एक मित्र ने कुछ सुंदर पंक्ति में अपनी बात को समझाने का प्रयास किया मित्र कहता है जिस दिन हम किसी उद्देश्य के अंतिम बिंदु को मस्तिष्क में बांध लेते है तो कोई ऐसा बिंदु नहीं होता है। जो हमें उस दुख या हार से तोड़ दे क्योंकि हम अंतिम का निर्धारण कर ही आगे बढ़ते हैं। यही सब तय करने का मौका देते है जो कभी सोच के धरातल से जमीन को तय कर देता है। 
बस जीवन का मूलमंत्र ऐसे ही तय कर आगे बढ़ते जाए।

Monday, 5 December 2016

किसी के लिए घृणा पैदा क्यों नहीं होती है?


पहली किश्त.........

सवाल खेल की तरह ही होते है जो बार-बार खेल खेलते रहते हैं। कभी इन खेलों में हार होती है तो कभी जीत। जिंदगी का कुछ पल ऐसे ही होता जिसमें एक पल हार निर्धारित होती है, तो एक पल में ही जीत। केवल अंतर के धरातल पर विचारों का अंतर होता है। जब हम विचारों के धरातल पर यह सोचने लगते है तो कुछ सवाल ऐसे तैयार हो जाते है, जो यह तय ही नहीं कर पाते घृणा विचारों के बिंदु पर पैदा होती है या किसी अन्य बिंदु पर धृणा की जमीन तैयार होती है।
 विचारों में हमेशा किसी बात को तय करना की कोशिश रहती है, जिसका धरातल मस्तिष्क पर ही पैदा होता जाता है। केवल बाहरी आवरण उसे धरातल पर लाने का काम करता है या फिर प्रयास की रूपरेखा देता है। लेकिन कहीं बिंदु ऐसे होते है जो घृणा पैदा ही नहीं करने देते। हम सोचकर भी किसी के प्रति घृणा पैदा नहीं कर पाते है। हम बस अपने आपसे यही पूछते है ....

घृणा पैदा कैसे की जाए?

Friday, 30 October 2015

कुमाऊं संस्कृति की संस्कार परंपरा (अंतिम संस्कार के संदर्भ में)

संस्कार की परंपरा भारतीय समाज को एक अलग पहचान दिलाती है.. संस्कार की परंपरा में बहुत सी परंपरा आती है। जिसमें जन्म के साथ नामकरण, मौत के साथ अंतिम संस्कार आते हैं.... दोनों ही संस्कार मनुष्य के जीवन का हिस्सा है.... लेकिन एक हिस्से में मनुष्य का चित होता है तो दूसरे हिस्से में बिना चित का मात्र देह(शव)... जन्म संस्कार में मनुष्य को अपनी पहचान के लिए नाम दिया जाता है....वही अंतिम संस्कार में उसका देह का अंत किया जाता है।
आज केवल कुमाऊं के पहाड़ी परंपरा के अंतिम संस्कार पर लिखा रहा हूँ .. जहां व्यक्ति खुद उपस्थित होकर भी खुद की उपस्थित दर्ज नही करा पाता है... कुमाऊं में अधिकत्तर जनसंख्या हिंदू धर्म को मानने वाली हैं.. जहां किसी की मृत्यु पर उसके देह को परिवार,गांव,समाज द्वारा अंतिम यात्रा दी जाती है .. जिसे कहा जाता है मलामी ... कुमाऊंनी संस्कृति में अंतिम यात्रा को इसी नाम से संबोधित किया जाता है... जहां नदी पर चिता का निर्माण किया जाता ... चिता से पूर्व गांववाले उस परिवार को सहयोग के नाम पर कुछ राशि देते हैं.. उसी के साथ-साथ अंतिम संस्कार के लिए कुछ लकड़ी भी देते हैं... जो चिता को बनाने में प्रयोग कि जाती है..... पहाड़ी जीवन की संस्कृति का यह हिस्सा है.. जिसे गांव के भाईचारे का संबंध कहा जाए या फिर ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा ... लेकिन यह संस्कृति ही एक गांव के समाज संबंध की नींव रखती है... जिसे आज भी गांव की संस्कृति कहा जाता है।
अंतिम यात्रा में संस्कार को नदी के किनारे किया जाता है जहां चिता को बनाया जाता है.. औरतों को आज तक अंतिम यात्रा में शामिल होने नही दिया जाता है .. जिसे हिंदू संस्कृति का हिस्सा माने या फिर यह माना जाता है स्त्रीयां शव को जलते हुए देख नही सकती है.. उनके कोमल स्वाभाव को भी कारण माना जाता है.. इसी कारण से महिलाओं को अंतिम शव यात्रा में शामिल नही होने दिया जाता है।
अंतिम संस्कार से पूर्व पिंड का दान किया जाता है। जिसे सूर्य को अर्पित किया जाता है.. नदी किनारे चिता का निर्माण किया जाता हैं... जहां देह को अग्नि के सुपूर्द कर दिया जाता है.. जहां उसके क्रिया कर्म करने वाले व्यक्ति के बालों का मुंडन करने की भी परंपरा को निभाया जाता है.. उसके पश्चात अंतिम संस्कार में आये व्यक्तियों को नदी के पास ही भोजन कराया जाता है... बाद में जिस व्यक्ति ने चिता को मुख अग्नि दी होती है .. उसे क्रिया कर्म करना होता है.. जिसे पुत्र द्वारा ही किया जाता है.. जिसमें बारह दिन की कड़े नियमों का पालन करना होता है ..जिसमें 10 दिन तक एक कलश में ज्योत जलाया जाता है .. और हर प्रातकाल को कुछ गांव के हिस्से में जाकर कुछ नियमों का पालन करना होता है .. जिसे पंडित द्वारा धार्मिक कर्मकाण्ड के अनुसार कराया जाता जाता है(पहाड़ी बोली में इसे गाड़ का काम कहते हैं) .. जिसमें रोज पिंड दान , नहाना आदि नियमों को किया जाता है.. साथ ही क्रिया पर बैठे व्यक्ति को एक अलग कमरे रख जाता है .. जहां महिलायें अंतिम क्रिया पर बैठे व्यक्ति को देखने की अनुमति नही होती है... क्रिया पर बैठे व्यक्ति को कफन का कपड़ा सिर पर बांधना होता है .. और 10वें दिन तक कलश में जले ज्योत की और सिर रख सोना होता है.. केवल एक समय खाना खाने कि अनुमति होती है.. वह भी कुछ नियम के अनुसार ही खाने की अनुमति होती है... उसी के साथ परदे का घेरा बनाकर क्रिया कर्म के व्यक्ति को रहना होता है .. जहां वह 12 दिन तक रहता है..आदि अन्य क्रिया कर्म के नियमों का पालन करना होता है।
10 दिन बाद परदे का घेरा खतम हो जाता है और परिवार द्वारा घर के सभी कपड़ों को धोया जाता है ..साथ ही गाड़ का कार्य खतम हो जाता है.. कलश के  ज्योत को 10 वे दिन नही जलाया जाता है। 12वें दिन बाद ही पंडित द्वारा घर में शुद्धि पूजा की जाती है ..  जिसे पीपल पीठा कहा जाता है .. जिसमें पंडित द्वारा पीपल के पत्तों की पूजा की जाती है .. जिससे माना जाता है .. अब घर पर शुद्धि हो जाती है...इन 12 दिनो में एक परंपरा मुखतक नाम की भी होती है जिसमे परिवार के मित्रगण, दूर के सगे संबंधी आदि जो मृत्यु पर शोक व्यक्त करने आते है... जिसमें..वार अर्थात् किसी विशेष दिन ही अन्य व्यक्ति शोक व्यक्त कर सकते है... जिसमें साधारण दिनों से उलटे दिन चुना जाता है.. जिसमें मंगवार, शानिवार जैसे वार शामिल होते हैं.. और क्रिया कर्म पर बैठे व्यक्ति को सांत्वना के शब्द के साथ कुछ दान दिया जाता है।
इसी तरह से अंतिम संस्कार की परंपरा पहाड़ों में प्रचलित है..साथ 12वें दिन पंडित को दान और पीपल पीठा कर घर को शुद्ध किया जाता.. और 12वे दिन गांव को चावल दाल का भोजन कराया जाता है.. और 6 माह के लिए अन्य कार्य छोड़ दिया जाते है .. लेकिन क्रिया पर बैठे व्यक्ति को 6 माह तक कुछ नियमों का पालन करना होता है ... जिसमें खाने में शुद्धता .. नहाने... पूजा आदि नियम शामिल होते हैं.. 12 वे दिन के बाद से घर के मंदिर में दिए जलाने शुरु हो जाते हैं... और क्रिया पर बैठा व्यक्ति अपने रोज के दिनचर्या में आ जाता है .. लेकिन 6 माह के बाद छमासी करनी होती है .. जिसमें पिंड दान ..पूजा .. गांववासीयों को भोजन करना आदि शामिल होता है।
जिस तरह से मनुष्य की जीवन यात्रा शुरु होती है उसका अंत भी होता है... जिस अग्नि से मनुष्य के जीवन को नामकरण संस्कार में हवन कर नाम दिया जाता है.. जिस अग्नि से मनुष्य खाने के लिए भोजन को पकता है... जीवन के साथ फेरे लेता है...एक दिन उसी अग्नि में अपने शव को जलते हुए इस दुनिया की यात्रा से अंत होता है...
अग्नि की भूमिका उसके जलने की प्रवृति ..अंत में मनुष्य के जीवन का भी अंत कर देती है। हर एक यात्रा का कोई अंत जरुर होता है.... वैसे ही जीवन की यात्रा का अंत अंतिम संस्कार नामक यात्रा से होता है.. जो बस उसकी यादों के साथ परिवार में रह जाती है.... बस एक यात्रा के समाप्त होने के साथ ही जीवन की दूसरी यात्रा का अनुमान लगाते है....
(अंतिम संस्कार में कई क्रिया कर्म के कार्य को किया जाता है...लेख में केवल कुछ की ही चर्चा हुई है)

संदर्भ सूची
गांव के बुजुर्ग व्यक्ति से बातचीत।
क्रिया कर्म की प्रक्रिया को देखना।

Wednesday, 2 September 2015

विरोध की आवाज कैसे उठेगी



 हम कितने भी नरम स्वाभाव क्यों ना हो ..जब तक व्यक्ति अपने सम्मान के लिए विरोध नही कर सकता है...उसके लिए नरम स्वाभाव हमेशा से ही विरोधाभाव बनकर रह जाता है.... और ऐसा मान-सम्मान स्वंय के साथ सबसे बड़ा धोखा होता है .. मैं आज चर्चा कर रहा हूँ कि कोई मनुष्य कब तक गलत विषय का विरोध नही करता है ..उसे वह हमेशा ढोहकर ही क्यों चलता है... वह हर बार गलत के प्रति मुंह क्यों फेर लेता है ... व्यक्ति को यह डर क्यों रहता है की वह विरोध कर अपने लिए विरोधी का गुट पैदा कर लेगा या फिर उसके पास विरोधी से ना लड़ने की समझ होती है और ना वह यह समझ पैदा होने देता है ... वह हमेशा यही सोचता है की विरोध कर वह स्वंय के लिए रोड़ा तैयार ना कर लें....इसी मानसिकता पर हम हर बार सोचते रहते है और हर रोज उस विरोध से भागने का प्रयास करते है .. कब तक इस विरोध से भागने की मानसिकता को हम हमारे जहन पर हावी रहने देंगे...कब तक हम विरोध के खिलाफ अपने आपको दूर रखने की कोशिश करते रहेंगे... कब तक गलत से नही लड़ने का प्रयत्न करते रहेंगे..मैं हर रोज ऐसे विषय पर मंथन करता हूँ.. लेकिन इस विरोध से भागने का प्रत्यन भी क्योंकि में स्वंय के लिए विरोधी पैदा नही कर सकता हूँ ....हम समाज के एक ऐसे प्राणी है जो जानवरों से अलग है ...इसलिए क्योंकि हमारे पास सोचने समझने कि ताकत है ....लेकिन जानवर भी गलत के समय विरोध करता है ...परन्तु हम मनुष्य होकर अपने मान-सम्मान के लिए संघर्ष नही कर पाते है ..ना ही विरोध... फिर भी हम अपने आपको मनुष्यता के दायरे में सिमेटते है.. फिर भी हम स्वंय के साथ गलत होने पर आवाज नही उठा पाते है...एक पत्रकार समाज में गलत होने के लिए लड़ता है ...मैं और मेरा समाज इसे मानते है ..जानते नही है ...क्योंकि हम मानने और जानने में अंतर नही कर पाते है .. हम और हमारा समाज मानने में ज्यादा यकिन करता है .....जानने में नही.. फिर भी जब विरोध शब्द आता है तो हमारा समाज मानने में ही अधिक यकिन करता है .... क्यों मनुष्य रचना विरोध को मानने तक ही सीमित कर रह जाता है....इस विषय को समझने की कोशिश करना आवश्यक है.....नही तो इस समाज में हर समय मानने की स्थिति का ही बोलबाला रहेगा तो....समाज कभी जानने कि स्थिति में नही आ पायेगा...पत्रकार की खेप आजकल कॉलेजों, विश्वविघालय में पैदा की जाती है ..जो पहले स्वंय पैदा होते थे.. अपनी लेखनी से जाने जाते थे ..आज राजनीति कि बिरादरी पत्रकारों को पैदा करती है ..और अपने अनुसार कलम भी चलाती है .. तो कहां पत्रकारों से उम्मीद करें की वह गलत के खिलाफ लिखेंगे...क्या विरोध की आस करें।बस सवाल आप पर छोड़ देते है ..... जवाब आप खुद ढूंढ़े।  

Saturday, 18 July 2015

विरोध है क्या?


विकिपीडिया पर विरोध के इतिहास को खोजने का प्रत्यन कर रहा था ..परन्तु मिला नही ... मिला तो केवल विरोध शब्द का अर्थ है प्रतिपक्षता... विरोध किसी भी रूप में हो सकता है ... जो जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के साथ जुड़ा रहता है....विरोध को परिभाषित करने का ना समर्थ है मुझमें ना समझ है?लेकिन विरोध करना भी जरूरी है? ... हर बात को केवल बिना विरोध के धारण कर लिया जाये तो विरोध शब्द की ना जरूत होगी ना उसके अस्तिव पर सवाल होगें ??..
विरोध में एक तरह की गूंज होती है ... जो स्वंय ही विरोध की रचना कर लेती है ....विरोध की गूंज चाहे दर्द की हो ... भय की हो ... अहंकार की हो .... चाहे मान-सम्मान की हो ...या फिर कोई भी विचार या विचारधारा की हो .... विरोध स्वर लेता है .....जिस समय अस्तिव पर सवाल होने लगते है... तो विरोध स्वाभाविक रूप से विरोध की धारण ओढ़ लेता है ...और संघर्ष करना शुरू कर देता है .... 
विरोध संघर्ष ही जो कभी आक्रोश के रूप में भी प्रकट होता है ...विरोध विजय की प्राप्ति पर ही आपनी आवधारण को समाप्त करता है ...विरोध में एक विरोधी की जिद्द होती है ... जिसमें अपनें विचारों से श्रेष्ठ विचार कभी नही दिखता ...उसे केवल विजय प्राप्त करनी होती है .. तभी उसका विरोध शांत होता है ..विरोध बुरा और सही दोंनो के लिए होता है ...जो जिसे रूप में देखे विरोध उसी रूप को धारण कर लेता है ...अच्छे के लिए अच्छा और बुरे के लिए बुरा ...लेकिन विरोध दोनों के लिए होता है ...सवाल कुछ भी हो ....विरोध आखिरकार विरोध ही है .....                                                                                  (सभी विचार विनोद के दशर्न आधारित है )


Tuesday, 14 July 2015

मीडिया की मंडी...


जिस मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है ... कभी उसे उस रूप में समझ ही नहीं पाया हूँ... मीडिया के क्षेत्र में आकार यही समझ आया है कि यह मंडी है... दल्लों की जहां.. हर कोई दलालगिरी करने में लगा है... और इसे लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में देखना सबसे बड़ी भूल होगी..
इस मंडी में वही दल्ला दलालगिरी कर सकता है ... जिसके पास दिमाग नामक विवेक है... लेकिन वह विवेक सच से परे दलालगिरी की मंडी में चलता है .. रोज सुनने में आता है .. फला चैनल बंद हो गया ...फला मीडिया हाऊस से इतने लोगों को नौकरी से निकाल दिया ...  आखिर क्या कारण होता है कि मीडिया की यह दुकान भी मौसम के फलों और सब्जियों के साथ रेहड़ी की दुकान लगाने जैसी हो गई है.... मौसम बदला और मंडी से फला मीडिया की दुकान बंद हो जाती है... बंद होने से पहले इन मंडीयों से शोषण के रूप में मीडिया के कथित रूप से कहे जाने वाले पत्रकारों की छंटनी शुरू हो जाती है... (क्या यह संकेत होता है)
जिसे मीडिया की मंडी कोस्ट कटिंग का नाम कहकर निकाल देती है... जो पत्रकार निकलता है वह इस शोषण का विरोध नहीं करता ...बल्कि नीति का खेल या फिर भाग्य का खेल मान ... अपने आपको मना रहा होता है ...  कि भाग्य में यही लिखा था और यहां का दना-पानी बस इतना ही है...
विरोध ना वह कर पाता है ..ना करना चाहता है क्योंकि उसे भविष्य में पत्रकार जो बने रहना .. जिससे उसे समाज में इज्जत मिलती... चाहे खाने के लिए घर में अन्न का एक दाना ना हो ..लेकिन कथित रूप से पत्रकार की मोहर जो लगाकर रखनी है ...
मीडिया की मंडी में शोषण की दुकान का लक्ष्य जो बने रहना है ...आखिर कब तक ????????
इस मंडी में वही टीक पाया है जो मंडी में दलाल की भूमिका आदा कर सके ... जो वैश्यों से बढ़ा जिस्म फरोसी की दल्लागिरी कर सके .. चाटुकारिता की मंडी मैडल सिने में लगाकर चल सके,, वही इस मंडी में टीक सकता है.. नहीं तो यह मंडी वैश्या की स्थिति में भी नहीं छोड़ती ..... कहने को इस मंडी में बुद्धिजीवों की बिरादरी... जो दिन दुनिया के शोषण की आवाज उठाते हैं ..लेकिन अपने शोषण में मालिक के गुलाम होते हैं ... जिसमें मालिक गलत को सही कहने को कहे तो यह बुद्धिजीवी सही कहते हैं और गलत को सही कहने के लिए ज्ञान की बौछार कर देते हैं ...
मालिक ही इनके ही सर्वा होता है ... जिसके लिये यह किसी से भी लड़ सकते हैं ...यह कहानी है चाटुकारिता के दल्लों की ...
बस शब्दों की दुकान को आज विराम देता हूँ ...मगर मीडिया की मंडी सदा ऐसे ही चलती रहेगी... मंडी से एक रेहड़ी गई तो दूसरी रेहड़ी आने को तैयार रहती है...

Friday, 17 April 2015

युवा का सपना

सपने-सपने ही होते है ....यह सोच हमेशा ही पलती है और चलती भी है ...आज का युवा रोज ही सपने की तलाश मेें रहता है .... किसी के जीवन के सपने भी उधेड़बुन जैसे ही होते जिसमें कल का पता नही है की सपने होते क्या?

Sunday, 18 January 2015

राजनीति की माटी

माटी का नाम लेते ही गांव की जो अनुभूति जहन में आती ...उसे क्या राजनीति की माटी से समझा जा सकता ..नही ना ...
राजनीति और गांव की माटी दोनों में अंतर है.. एक में स्वार्थ है ..तो एक में प्रेम...
दिल्ली की राजनीति माटी में जिस तरह के द्वंद युद्ध को देखा जा सकता शायद ही ऐसा युद्ध और राजनीति  देखने को मिलें...
सामाज को भलाई की और मोड़ने वाले ही राजनीति का गंदा खेल खेलने लगे तो लोगों में आक्रोश होना स्वाभाविक है ...
कभी किरण बेदी ..सामाज को भ्रष्टाचार मुक्त करनें की कसम खाती थी मौका देख ..राजनीति की नौका में सवार हो गई ...कभी भाजपा पार्टी पर आरोप जड़ा करती थी ...आज उसी नौका के गुणगाण गा रही  है.. राजनीति की माटी का रंग निराला है जो किसी को भी अपनी ओर खींच लेता है..
शाजिय़ा इल्मी ने भी मौका देख चौका लगा ही लिया ...राजनीति की तुलना भुख से करें तो कोई गलत नही होगा....राजनीति एक भुख ही ...जो स्वार्थ ..लालसा ...इच्छा हैं.....


Friday, 16 January 2015

मुझे सत्ता की लालसा नही..

मुझे सत्ता की लालसा नही ...सत्ता अपने आप मोह करा देती है...कहने में बड़ा अच्छा लगता है...दिल्ली के चुनाव में जो अब हो रहा है ..सत्ता का मोह है या फिर एक अंह का द्वंद ....जहां आप के केजरीवाल नाम से किरण बेदी के मन में उबला पैदा हुआ ...जो सामाजिक कार्य छोड़ राजनीति की हवा को महसूस करने के लिए सत्ता की लालसा को भाजपा में तलाश करनें लगी ...यह सारे एक तर्क है जो किरण बेदी के भाजपा में जाने पर लोग के जहन पर पानी के झींटे की तरह आ रहे है ..जो नींद से उठाने की कोशिश कर रहा है ..मगर नींद को पूरी तरह खोल नही पा रहा है .
राजनीति इसी तरह लालसा बनाती है ...जिसे मोह कहे सकते है...


Tuesday, 23 December 2014

धर्म के ठेकेदार....

धर्म के नाम राजनीति की रोटी सकते लोगों पर घृणा भी आती है और तरस भी ....क्या सत्ता की भूख ऐसे ही धर्म के नाम पर चलती रहेगी ...सवाल मेरा नही ..पूरे उस इंसानी कौम का...जो संवेदनशील है.. जिसे अपनी इंसानियत पर पर गर्व होता हो..आज के समय में राजनीति में एक नई बहस का सूत्रधार हुआ है...नाम है धर्मंतारण .....जिस पर सत्ता ही नही ..सत्ता कि चाह रखनेवाले भेड़ियें आपनी आंख लाग कर बैठे हुए हैं...ऐसे भेड़़ियों को अपनी गंदी राजनीति की भूख मिटाने के लिए नया विषय मिल गया है....अपनी निजी लाभ कि राजनीति में हर कोई अपना हाथ साफ करने कि जद्दोजहद में है....कभी भी ताली एक हाथ से नही बजती उसकी पुष्ठभूमि को काफी लंबे समय से तैयार किया जाता है...इस मुद्दें ने तुल उस समय पकड़ा जब आगरा में हिंदू जागृति मंच ने कुछ मुसलमानों को हिंदू बना दिया और खबर के प्रकाशित होकर जनता तक आने में मीडिया ने एेसा रंग दे दिया कि यह धर्मपरिवर्तन सारे समाज के ठेकेदारों के लिए राजनीति का विषय बन गया ..जिस पर राजनीति दल को देश के अन्य कार्य छोड़कर सबसे बड़ा मुद्दा मिल गया... जो मात्रा अपने लाभ के लिए सियासत का हिस्सा बन गया ..जहां समाज एेसे मुद्दों से बचता आया है ..जिस विषय से समाज का माहौल खराब होता हो ...राजनीतिक दल और धर्म के ठेकेदार रोटी सकने लगे हैं...यह सारा विषय समाज को सोचने को मजबूर करता है कि ऐसे विषय को समाज कैसे समझे? क्याें समझे? किस तरह से समझे?...
 आगरा कि घटना के बाद मीडिया कि दल्ला पत्रकारिता ने इस विषय को दिनों दिन रंग पर रंग देता जा रहा है....राजनीति के भूखे इस विषय पर मीडिया के साथ हाथ से हाथ मिला कर चल रहे है ...जैसे यही वह विषय है जिससे पर विजय प्राप्त कर समाज का उद्धार कर देंगे .....देश कि गरीबी ,भूखमरी,विकास, बेरोजगारी आदि सभी विषय पर जैसे इन समाज के ठेकेदार राजनेताओं ने विजय पा लिया हो और कोई विषय इन ठेकदारों के पास बचा ही ना हो...तरस आता है इन नेताओं पर  ...
समझ नही आता इन पर घृणा करें..तरस खायें ..या फिर इन नेताओं का  मातम बनायें ....यह देश हमारा है ..हम इंसान हैं ...तो इंसानियत कि कदर करें ....

भाई साहब नेताजी जिसे जिस धर्म पर आस्था है उसे उसी धर्म में रहने दें ...उस पर राजनीति का नंगा खेल ना खेले ...ना ही उसे बहस का विषय बनायें...
 (लेख का और विषय कुछ दिन बाद आयेगा...) 

Monday, 1 December 2014

सत्ता कि लालसा.....

सत्ता का लालच कोई कभी नहीं छोड़ता..जिसके पास सत्ता है वह सियासत के पाले मेें गिने जाता है ..जिसके पास नही वह सत्ता से अलग में गिने जाते है ..समाज कि कड़ी भी ऐसी ही सत्ता के इर्द गिर्द घुमती है....जहां जिसके पास पद , प्रतिष्ठा, धन, शौर्य है वह महान है...सत्ता के बल पर सब महान गिने जाते है ...जहां सत्ता का सिक्का बोलता हैं ..जिस दिन सत्ता कि छुटी होती है उसी दिन से सत्ता के धरासायी होने का असर दिखना शुरु हो जाता है...सत्ता समाज में आदर का भाव पैदा कर देती है...उस के पीछे ढकोसले कि एक ओर सत्ता काम करती है ...
चलिये राजनीति के रुप में सत्ता को समझने का प्रयास करते हैं.. राजनीति सत्ता कि सी़ढ़ी का पहला द्वार है.. जिस मैदान से सत्ता के सत्ता रुपी अस्त्र  के इस्तेमाल कि शुरुवात होती है.... सत्ता का प्यार कहीं बुनियाद को दाव पर रख नयी बुनियाद कि नींव रखता है ...उस नींव कि जड़ कहां तक फैली होती है उसका अनुमान सत्ता के पाने के बाद समझा जा सकता है...सत्ता के खेल में कहीं बाजी दाव पर होती है ..जहां जमीर का सौदा भी बोली में आ जाता ...जमीर को मार ही सत्ता के सुख कि अनुभूति को प्राप्त  किया जाता है..सत्ता के यह कुछ गुण है..
सत्ता ऐसे ही दाव पर अपने वजूद को कायम करती है..सत्ता के लाभ पर राजनीतिक दल एक पाले को बदल दूसरे में अपना स्वार्थ कि पूर्ति करते है...जहां विचारधारा के कट्टर विरोधी भी मित्र बन जाते है...राजनीति में ऐसे कहीं उदाहरण देखने को मिल जाते है ... हरियाणा में राव इंद्रजीत सिंह...वही दूसरी ओर चौधरी बीरेंद्र सिंह...चाहे कोई कितना भी बड़ा दिग्गज हो सत्ता कि लालसा उसके विचारों के जमीर को मार ही देती है..सत्ता का लालच है ही ऐसा..
यह तो रहा राजनीति के कुछ उदारहण ..जब यही सत्ता आम जन के जीवन पर हो तो सत्ता का लालच बहुत गंभीर रुप धारण कर लेता है...सत्ता कि लालसा में इंसानियत के मर्म कि बलि लागाई जाती हैं..जहां सब कुछ का अंत होता है... उस अंत से निकलना मुश्किल हो जाता ...उस चोट के घाव बाहरी रुप में नही होते ..पर घाव कि चोट इंसानियत के सब पयदान तोड़ अपने होने का एहसास करता हैं...एेसी चोट ना गवारा होती है ...और ना कभी उम्मीद कि जाती है...यही सत्ता है ..जिसका मोह सत्ता होना कहलाती है.... सत्ता ...सत्ता है भाई...

Friday, 28 November 2014

पड़ाव से गुजरती जिंदगी...

मुझे विषय नही मिल रहा था कि क्या लिखूं ...काफी सोचने के बाद मित्र नें विषय दिया .."किशोर कि सोच"..लोकिन इसके बाद विषय में लिखूं क्या यह समझ नही आ रहा था .तो शुरुवात कि जीवन के पड़ाव से..
जीवन के हर पड़ाव को बस कुछ नामों से सम्बोधित करते ...कभी बचपन ..कभी जवानी ..तो कभी बुढ़ापा ...जीवन इन पड़ावों से गुजर कर अपना रास्ता तय करता है...सभी पड़ाव के अपने-अपने दायरें है...सभी कि अपनी उपयोगिता है...
कोई भी पड़ाव छुटे अंत नही होता ...कहने का अर्थ है कि मौत इन पड़ावों के बाद ही अपनी गति को रोकती है...
पहले पड़ाव कि बात करें तो इस कोइ कभी नही भुल सकता ..इसके होने कि महक ता उर्म इंसान के जहन में अपने होने का अर्थ देती है..जिसे नकार देना इंसान कि सबसे बड़ी भूल हो सकती है..उम्र बितने के साथ इंसान यह कहना नही भूलता की बचपन में मैंने ऐसा किया और ऐसा नही ..यह वाक्य उसके जहन में हर वक्त रटा रहता है ....इन वाक्यों के बिना इंसान अधूरा ही होता है..
बचपन के हर लम्हें को हम जैसा चाहे जी सकते ना किसी का दबाव होता है ..ना किसी कि बंदिश होती है ...हम अपनें विचारों से ...भाव से ..मन से ...जहन से..दिल से..दिमाग से...दबाव से ...हर रुप में पाक साफ होते हैं ...जहां गलतियाँ बचपनें के नाम से मशहूर होती हैं...तभी तो कहते बचपन -बचपन हैं जिसे कभी भुला नही जा सकता...जिसे जैसे रुप में उसे समझना है ...वह वैसे समझ सकता है ..मन आपका है ..तो सोचने कि इच्छा भी आपकी है ...बचपन भी आप का ही है...
दूसरे पड़ाव में जिन्दगी उलझने पैदा करना शुरु कर देती ..जहां बचपन का बचपना दुर हो जाता है ...समझ का दायरा पैर प्रसार लेता है...जहां गलतियां ...गलती में गिनी जाती है...अब बचपन अपने दायरें को बहुत पीछे छोड़ देता है...उलझने सीमा से परे सोचने को मजबूर करनें लगती है...अब जहन ..भाव..विचार... सोच ...मन ..उम्मीद..बंदिशें ...सब का दायरा बड़ जाता हैं...अब समझ नही होती... रटी बातें प्रभावी होती हैं...जहां बाहरी अडंबर हावी होता ..किसी को किसी जिद्द होती ...जहां भागने कि कोशिश रहती है...रेस में सब से आगे निकलने कि चाह हावी होती...जहां लड़ाई दूसरे से  ज्यादा अपने आप से होती है...
यह पड़ाव अपने में सब कुछ समा कर रखता है ..जिसे जिताना खोजे वह उतना जहन को निचोड़ता है...कभी दायरें मजबूरी का रुप लेते है ...अब जीवन तरह-तरह के रंगों से भरें होने कि जगह ..बेरंग छवि का होता है ...अब बचपन जहन में खुशी का संचार का माध्यम होती है ..जिसे सोचकर खुश होने का मंत्र लिया जाता है .......  
ऐसा नही कि हर दूसरे पड़ाव में हर कुछ उलझन में होता है...कुछ उलझने समझते-समझते जीवन के होने का अर्थ समझने में असानी हो जाती हैं... और बहुत कुछ अच्छा भी होता है..जहां आशा...दिलासा...उम्मीद....धैर्य ...कर्म...ओर बहुत कुछ जीवन को बांध कर रखता है...कुछ पल को व्यक्ति बस समझता है...कि यह नियम संसार में सब के साथ बंधा होता है..उस से भागा नही जा सकता ..उस का होना एक निर्धारित क्रम में जीवन ने लिखा ...बस उस का सामना करना ही अंतिम लक्ष्य है ...जहां विजय आपके साहस पर है ...आप अपने आपसे विजय होकर संतुष्ट होते है..
तीसरा पड़ाव बुढ़ापा है..जो आना सबके साथ तय....यह फिर हमें बचपन कि ओर खींच लेता है ..जहां अंत का इंतजार होता हैं .. बस ...इंतजार...इंतजार ...ओर इंतजार....



Thursday, 27 November 2014

वक्त-वक्त कि बात है ....

वक्त-वक्त कि बात है ...यह बात लोगों के जहन से कई बार सुनी होगी ...यह बात जितने कम शब्दों में उसका महत्व भी उतना ही बड़ा है...लोगों के साथ होता भी ऐसा ही...वक्त कब करवट खाये और कब नही यह बड़ा खेल है...जिन्दगी में कोई कभी राजा होता है ..तो  कोई कुछ पल में फकीर ..इसलिए तो कहते है वक्त-2 कि बात है...
उदारहण के रुप में एक प्रधानमंत्री को ही ले लेते है..कभी मनमोहन सिंह वह व्यक्ति होते थे जो  देश के सब फैसले लेते थे...सरकार गई... वक्त गया ..सब बदल जाता है...जब वह प्रधानमंत्री थे ...तो उनका पद बोलता था ...आज वह कुछ नही तो बस वह एक साधारण व्यक्ति के रुप में गिने जाते है...इसलिए तो कहते है वक्त-2 कि बात है..
वक्त कब किस के साथ हो कब नही यह वक्त पर निर्भर  करता है..वक्त कि लकीर किस पर कैसे खींचेगी
यह उसका कर्म और किस्मत लिख कर आता है...आज कोई दुखी है... तो उसका वक्त है दुखी होने का ..एक समय बाद वह मुस्कराहट फिर मिलेगी जो उससे वक्त ने छिनना है ..बस कुछ वक्त बनता ही है ..जीवन को कुछ सीखानें के लिए ..ताकि उस वक्त को भी महसूस कर सकें..
बिना महसूस किये उस वक्त को कोइ कभी नही समझ सकता ..जब तक उस परिस्थितियों के साथ खुद ना गुजरें हो...उस एहसास को जब तक अपने से महसूस नही करें .. सब परिस्थितियां कुछ ना कुछ  सीख देती है...

दुसरे के पास उस समय में सांत्वना देने के सिवा ओर कुछ नही होता ..ओऱ वह कर भी क्या सकता है इससे ज्यादा...दोषी परिस्थितियां होती हैं...इंसान नही...
किसी के शब्दों में...जहां वक्त ने जो निर्धारित किया होता है... वह वहीं पहुंचता ..बस उसकी राह कैसे उसे वहां तक पहुंचायेगी यह उसे नही पता होता ..अंत उसका अपने निर्धारित गंतव्य पर होगा ..जहां सब अच्छे होने कि उम्मीद होती है ..उस उम्मीद को कभी किसी को नही छो़ड़नी चाहिए..
इसलिए तो कहते है वक्त-2 कि बात है.....



Tuesday, 18 November 2014

चाटुकारिता की सीमा

मीडिया की जो कल्पना आम जन करते हैं ..मीडिया उससे कोसों दूर है...जब हम मीडिया कि हवा को बाहर से महसूस करने कि जगह ..उसके साथ काम करना शुरु करते है ..तो मीडिया का सही रुप प्रदर्शित होता है ..... मीडिया है क्या ?... साधारण से शब्दों में परिभाषित करने की कोशिश करे तो ऐसी वेश्यावृति जो शरीर की नही...पर दिमाग की वेश्यावृति की जाती है ...जिसका सौदे का दल्ला उस कंपनी को चलानेवाला मलिक होता है...जिसे दह कि जगह दिमाग का सौदा करना होता है...
 मलिक (दल्ला) भी ऐसा जिसे सौदे में क्या बेचना हैं यह नही पता ...बस यह पता होता है कि सौंदे के लिए ग्राहक मिल जाए.....उसकी तलाश में ठोकर खाता है...ठोकर में साथ देने के लिए चाटुकारों की टीम होती है...जो पत्रकारिता के अह को मार दल्लों कि पत्रकारिता शुरु करने लगते है ....फिर कहते है पत्रकारिता तो यह होती है ...जहाँ दल्लेबाजी के गुण दिखें ...नही तो पत्रकार कि अह की सीमा जो टूट जायेगी ....
  पत्रकार बेचारा करे भी तो क्या करे उसे अपने परिवार को जो पालना है ....नही तो उसे बाबाओं कि तरह जीवन जीना पड़ेगा ...जो हर कोइ नही कर सकता..



(विचार मेरे निजी है जिसको दिल पर ना लें...)

Monday, 17 November 2014

फिर समय चलेगा........

रुकने के लिए कुछ नही होता है..सृष्टि का विधान है ....जो आया है उसे जाना है..
हमारे पास भी ऐसा क्या है ....जो यहीं रुक जाता है ..कहने को तो कुछ नही और सोचने को बहुत कुछ....
विचारों की ऐसी ही गुत्थागुत्थी  जहन में दोड़े तो...
विचारों में कैसे शुद्धता हो सकती हैं...जहन ऐसे ही सवालों के जाल में फंस कर गुत्थ जाता हैं..

आप अपने से पूछों की क्या है सोचने को 
क्या है परकने को...
जहन आपका विचार आप के ...
फिर क्यों भागने कि कोशिश कर रहा..
जो उलझन थी वह उलझ ही गई  है...
  
जो सुलझनी थी वह सुलझेंगी ही है...

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Wednesday, 12 November 2014

किसी को इज्जत ...मजाक लगती

कई बार कुछ ऐसा होता हैं....जहां समझ की समझदारी के परकच्च उ़ड़ जाते हैं....उधर समझदारी यही होती है की शांत रहो..नही तो कुछ शब्द बाण की तरह अगात ही देते हैं..
 जीवन में यह सवाल जरुर उठते हैं की गलती हमारी होती है या गलती को समझने की कोशिश ही नहीं करना चाहते..लोग गलती को समझने से पहले ही उस का हल ही ढ़ूढ़ कर बैठ जाते है ...किसी गलती को स्वीकार नही करते या करना नही चाहते ..
सवाल बड़ा टेढ़ा है ..फिर भी कभी-कभी सोचना ही होता है..
की इज्जत मजाक न बन जाये....
  जब यह सवाल जहन से नीचे न उतरे तो लोगों की सोच किधर तक सोच सकती है ..वहां तक उस सोच को सोचना जरुरी हो जाता है....नही तो शरीर बहार से सही होता हैं ..परन्तु दिमाग में सवाल ही घूमते हैं....



सवाल घूमने से दिमाग की कसरत होती हैं इसलिये सवाल घूमने जरुरी हैं............